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Thursday, March 21, 2019
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चंडीगढ़ को डिसेबल फ्रेंडली शहर बनाने के लिए समाज का सहयोग जरूरी

March 08, 2019 10:10 AM

चंडीगढ़ - शहर को डिसेबल फ्रेंडली चंडीगढ़ बनाने के प्रयास को एक कदम आगे ले जाते हुए वीरवार को पंजाब यूनिवर्सिटी के गांधी भवन में ‘जेन नेक्सट डिसेबिलिटी इंक्लूजन’ विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया। इस सेमिनार को संयुक्त तौर पर पंजाब यूनिवर्सिटी के कम्युनिटी एजुकेशन एंड डिसेबिलिटी स्टडीज विभाग, स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी, चंडीगढ़, चंडीगढ़ कमीशन फॉर प्रोटेक्शन आफ चाइल्ड राइट्स (सीसीपीसीआर), आरुषि भोपाल और शहर की स्वयं सेवी संस्था युवसत्ता (य़ूथ फॉर पीस) की ओर से आयोजित किया गया था।

सेमिनार में उपस्थित प्रमुख लोगों में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस एबी चौधरी, पंजाब यूनिवर्सिटी के वीसी प्रो.राज कुमार, स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के मेंबर सेक्रेट्री महावीर सिंह और सेक्रेट्री अमरिंदर शर्मा, चंडीगढ़ कमीशन फॉर प्रोटेक्शन आफ चाइल्ड राइट्स की चेयरपर्सन हरजिंदर कौर, गवर्नमेंट मेडिकल कालेज एंड हॉस्पिटल के डॉयरेक्टर डॉ.बीएस चवन, सेंटर फॉर सोशल वर्क, पंजाब यूनिवर्सिटी की चेयरपर्सन डॉ.मोनिका मुंजाल, पंजाब यूनिवर्सिटी के कम्युनिटी एजुकेशन एंड डिसेबिलिटी स्टडीज विभाग की चेयपर्सन डॉ.डेजी ज़राबी और युवसत्ता के फाउंडर-कोआर्डिनेटर प्रमोद शर्मा शामिल थे। 

अपने स्वागत संबोधन में प्रो.राज कुमार ने कहा कि इसे सुगम और डिसेबल्ड फ्रेंडली बनाने के लिए यूनिवर्सिटी के फेज-वाइज डेवलपमेंट की जरूरत है। उन्होंने उपलब्ध संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग और सभी की भागीदारी पर भी जोर दिया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि जस्टिस एबी चौधरी ने कहा कि दिव्यांग लोगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए अड़चनों को पहचानने के साथ साथ उन्हें हटाने की जरूरत है और यह संभवतः कानून, नीतियों, संस्थानों और वातावरण में बदलाव से ही मुमकिन होगा।

दिव्यांग लोगों के लिए विशिष्ट कार्यक्रमों और सेवाओं की शुरूआत की तत्काल आवश्यकता है तथा राष्ट्रीय विकलांगता रणनीति और कार्य योजना को अपनाना समय की जरूरत है। इसमें संबंधित एजेंसियों को दिव्यांग लोगों को शामिल करना चाहिए, ह्यूमन रिसोर्स क्षमता में सुधार करना चाहिए और सबसे जरूरी यह है कि उन लोगों में विकलांगता संबंधी जागरूकता बढ़ाने के लिए जागरुकता कार्यक्रमों की आवश्यकता है जो कि एजुकेशन, हेल्थ केयर, मीडिया जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं।

अपनी प्रेजेंटेशन में डॉ.बीएस चवन ने कहा कि चंडीगढ़ को सही मायनो में डिएबल फ्रेंडली शहर बनाने के लिए लोगों और समाज के सहयोग की जरूरत है। हमारा उद्देश्य दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाना होना चाहिए। उन्होंने दिव्यांगों के रीहैबिलिटेशन के लिए उनके विभाग द्वारा शुरू किए गए कई इनिशिएटिव्स के बारे में भी जानकारी दी।

ग्लोबल फोरम फॉर एमपावरमेंट, नई दिल्ली की चेयरपर्सन व फाउंडर आभा नेगी ने कहा कि जो बाधा रहित जो इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप हो रहा है वह न सिर्फ दिव्यांगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में विफल है बल्कि समाज का एक बड़ा वर्ग भी है जिसमें बच्चे, बूढ़े और महिलाएं भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यह मुश्किल जरूर है लेकिन नामुमकिन नहीं है क्योंकि इसे लिए सिर्ऱ माइंडसेट में बदलाव और गंभीरता से प्रयास करना जरूरी है।

डिसेबल फ्रेंडरी चंडीगढ़ विषय पर सत्र की अध्यक्षता करते हुए महावीर सिंह ने कहा कि चंडीगढ़ जैसे आधुनिक शहरों में भी न तो एक भी ऐसा एटीएम है जो डिसेबल फ्रेंडली है और न ही पब्लिक पार्क या मार्केट है। इसलिए हमें अभी काफी आगे तक जाना है। अलग अलग सत्रों में विचार रखने वालों में डॉ.वी मोहन कुमार, आरुषि के संस्थापक अनिल मौदगिल, आरुषि के डॉ.रोहित त्रिवेदी तथा पीयू के विभिन्न विभागों के प्रोफेसर्स, स्पेशल एजुकेटर्स और रिसर्स स्कॉलर्स शामिल हैं।

अपने संबोधन में युवसत्ता के संयोजक प्रमोद शर्मा ने कहा कि हम लंबे समय से विविधता और समावेश के बारे में बात करते हैं। अभी भी ऐसे पर्याप्त सुबूत हैं जो दिव्यांगों के साथ हो रहे भेदभाव को बताते हैं। डॉ.डेजी जराबी ने कहा कि बच्चे का दिव्यांग होने का मतलब यह नहीं है कि वह मुख्यधारा वाले स्कूलों में दाखिला नहीं ले सकते हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जो सीखने वाले सभी बच्चों के लिए समान हो।

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