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भगवान एक विश्वास का नाम है, जो कण-कण में बसता है - स्वामी विवेकानंद

January 12, 2020 08:17 AM

12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद का जन्म दिवस है, उनका नाम लेते ही सिर श्रद्धा से झुक जाता है, नई सोच और 'जो कहो वो कर दिखाने' का जज्बा रखने वाले विवेकानंद एक अभूतपूर्व मानव थे, विवेकानंद का वास्तविक नाम नरेंद्र नाथ दत्त था, मात्र 25 साल की उम्र में अपने गुरु से प्रेरित होकर उन्होंने सांसारिक मोह-माया त्याग दी और संन्यासी बन गए थे, उनके विचार बेहद अनमोल हैं, जिनका पालन करके इंसान सदैव तरक्की की पा सकता है।जब राजा ने विवेकानंद से पूछा-कहां है भगवान

उनसे जुड़ी बहुत सारी कहानियां हैं, जो हमेशा हमें शिक्षा देती हैं, ऐसी ही एक कहानी का जिक्र हम यहां आज करते है, एक बार की बात है, एक बार एक राजा ने स्वामी विवेकानंद को अपने घर में बुलाया और बोला कि तुम लोग पत्थर की पूजा करते हैं, उन्हें अपना भगवान मानते हैं, लेकिन वो तो मात्र पत्थर है, मैं इसे नहीं मानता हूं, तुम लोग पाखंड करते हो, कहां हैं तुम्हारा भगवान, क्या वो सोच सकता है, बोल सकता है, सुन सकता है।

स्वामी विवेकानंद शांति से उसकी बात सुन रहे थे, तभी उनकी नजर उस राजा के सिंहासन के पीछे लगी एक तस्वीर पर पड़ी, विवेकानंद ने राजा से पूछा कि राजन, ये तस्वीर किसकी है?राजा ने बोला-मेरे पिताजी की, तब स्वामी विवेकानंद बोले-उस तस्वीर को अपने हाथ में लीजिए और उस पर थूकिए।

'भगवान एक विश्वास का नाम है, वो पत्थर, नदी, फूल, पहाड़ हर जगह है'

इतना सुनकर राजा आपे से बाहर हो जाता है और वो स्वामी विवेकानंद को कहता है कि आपके होश ठिकाने हैं, इस पर विवेकानंद ने कहा आप क्यों नहीं कर सकते हैं, ये तस्वीर तो केवल एक कागज का टुकड़ा ही तो है, इसमे ना तो जान है, ना आवाज, ना तो ये सुन सकता है, और ना ही कूछ बोल सकता है, इसमें ना ही हड्डी है और ना प्राण, फिर भी आप इस पर कभी थूक नहीं सकते क्योंकि आप इसमे अपने पिता का स्वरूप देखते हैं और आप इस तस्वीर का अनादर करना अपने पिता का अनादर करना ही समझते हैं।

उसी तरह से भगवान है, भगवान एक विश्वास का नाम है, वो पत्थर, नदी, फूल, पहाड़ हर जगह है, वो भले ही बोलता नहीं लेकिन हमारी सुनता है, वो कहता नहीं लेकिन हमारी हर बात को समझता है, इतना सुनने के बाद राजा को अपनी गलती का एहसास होता है औऱ विवेकानंद से क्षमा मांगता है।

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